माइनिंग इंडस्ट्री के दिग्गज कारोबारी अनिल अग्रवाल ने रविवार को दावा किया कि उनकी कंपनी वेदांता को जेपी ग्रुप की संपत्ति की बोली जीतने की लिखित पुष्टि मिल गई थी, लेकिन बाद में ये फैसला बदल दिया गया। हालांकि, उन्होंने इसके कारणों पर विस्तार से कोई जानकारी नहीं दी। अग्रवाल ने सोशल मीडिया पर कहा कि वेदांता को दिवालिया प्रक्रिया के तहत जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड (JAL) को खरीदने के लिए सार्वजनिक रूप से सबसे ऊंची बोली लगाने वाला घोषित किया गया था। उन्होंने बताया कि उन्हें लिखित रूप में ये जानकारी दी गई थी कि उनकी कंपनी बोली जीत चुकी है, लेकिन कुछ दिन बाद ये निर्णय बदल दिया गया।
बोली में अडाणी ग्रुप था दूसरा सबसे बड़ा दावेदार
जेपी ग्रुप की इस प्रमुख कंपनी के लिए बोली में गौतम अडाणी का ग्रुप ही दूसरा बड़ा दावेदार था। ऋणदाताओं की समिति (सीओसी) ने दोनों कंपनियों की बोलियों का मूल्यांकन किया और बाद में अडाणी ग्रुप की बोली को मंजूरी के लिए राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) में भेज दिया। NCLT की इलाहाबाद पीठ ने अडाणी ग्रुप की बोली को मंजूरी दे दी, जिसके खिलाफ वेदांता ग्रुप ने राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) में चुनौती दी है। हाल ही में हुई सुनवाई में NCLAT ने NCLT के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया और मामले की अगली सुनवाई 10 अप्रैल को तय की गई है। अग्रवाल ने कहा कि वो इस फैसले में बदलाव के कारणों पर ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहते और ये मामला उचित मंच पर तय होगा।
जयप्रकाश एसोसिएट्स पर 57,185 करोड़ रुपये का कर्ज
उन्होंने ये भी कहा कि ये मामला उन्हें जेपी ग्रुप के संस्थापक जयप्रकाश गौड़ के साथ हुई बातचीत की याद दिलाता है, जिन्होंने इच्छा जताई थी कि उनकी संपत्तियां सुरक्षित हाथों में जाएं। उन्होंने कहा, ''हमें इस संपत्ति से कोई लगाव नहीं है। अगर ये हमें मिलती है तो ये ईश्वर की कृपा है, और अगर नहीं मिलती तो वो भी उनकी इच्छा है।'' जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड को जून, 2024 में दिवालिया प्रक्रिया में शामिल किया गया था, क्योंकि कंपनी पर करीब 57,185 करोड़ रुपये का कर्ज था। पिछले साल नवंबर में ऋणदातों की समिति ने अडाणी ग्रुप की योजना को मंजूरी दी थी।
ऋणदाताओं की समिति ने विवाद पर क्या बोला
अडाणी ग्रुप की कंपनी अडाणी एंटरप्राइजेज को ऋणदाताओं के 89 प्रतिशत वोट मिले, जबकि अन्य दावेदारों में डालमिया सीमेंट और वेदांता ग्रुप शामिल थे। ऋणदाताओं की समिति (सीओसी) ने अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा कि बोली का चयन सिर्फ सबसे ज्यादा कीमत के आधार पर नहीं, बल्कि नकद भुगतान, व्यवहार्यता और समय पर क्रियान्वयन जैसे कई पहलुओं को ध्यान में रखकर किया जाता है। ऋणदाताओं की समिति ने अडाणी ग्रुप की बोली को इसलिए प्राथमिकता दी क्योंकि इसमें करीब 6,000 करोड़ रुपये तुरंत भुगतान और दो साल में पूरा भुगतान करने का प्रस्ताव था, जबकि वेदांता की योजना में भुगतान की अवधि 5 साल तक थी।